ब्रेस्ट कैंसर के बारे में महिलाओं को जागरूक करना ज़रूरी है- डॉ. नुपूर गुप्ता, ओबीएस और स्त्री रोग विशेषज्ञ

डॉ.नुपूर कहती हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह अंतिम अवस्था में पता चलता है।


मातृत्व कई महिलाओं के लिए एक वरदान है मगर इस समय ब्रेस्ट कैंसर होने का डर भी रहता है। गर्भावस्था के दौरान या फिर पहले साल के प्रसव के बाद कैंसर का पता चलता है तो इसे गर्भावस्था से जुड़े ब्रेस्ट कैंसर कहा जाता है।  प्रजनन की अवधि में इस बीमारी के होने का ख़तरा बढ़ जाता है। करीब तीन हज़ार में से एक महिला से इससे प्रभावित होते हैं।

वेल वुमन क्लिनिक की निदेशक, ओबीएस और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नुपूर गुप्ता एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त स्त्री रोग विशेषज्ञ सर्जन है। ये नैदानिक और ऑपरेटिव स्पेक्ट्रोस्कोपी, एंडोमेट्रियल एब्लेशन, हिस्टेरेक्टॉमी के विकल्प और असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव की विशेषज्ञ हैं। नुपूर पिछले बीस सालों से अधिक समय से गुड़गांव में प्रैक्टिस कर रही हैं। गुड़गांव में वेल वुमन क्लिनिक के संस्थापक और सह निदेख हैं। उनके द्वारा लिखे कई लेख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

उनके पास चिकित्सा क्षेत्र का व्यापक अनुभव है। साथ ही वे क्लिनिक शल्य विशेषज्ञता में भी माहिर हैं। वो न केवल विशेषज्ञ के रूप में बल्कि एक औरत होने के नाते वो दूसरों की चिंता भी समझती हैं। वो  बड़े-बड़े पत्रिकाओं में लिखती रहती हैं। साथ ही उन्हें इंटरनेशनल जर्नल ऑफ स्त्री रोग और प्रसूति के लिए विशेषता समीक्षक के रूप में मान्यता दी गई है ।

वे कहती हैं इन दिनों काम-काज की वजह से लोग देरी से माता-पिता बन रहे हैं और इसकी वजह से गर्भावस्था से संबंधित कैंसर की बीमारी बढ़ती जा रही है। गर्भाधारण में हो रही देरी की वजह से बढ़े पैमाने पर ब्रेस्ट कैंसर की समस्या सामने आ रही है। यह आने वाले समय में इसे और बढ़ने की उम्मीद है।

प्रारंभिक निदान

अगर शुरूआत में ही अगर बीमारी का पता चल जाए तो गर्भवती महिला को प्रारंभिक अवस्था में ही इलाज किया जा सकता है। गर्भावस्था के पहली तिमाही के दौरान, डॉक्टर ब्रेस्ट का टेस्ट कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान खुद इस पर नज़र रख सकते हैं।

ब्रेस्ट पर एक स्पष्ट घाव या मोटा परत हो सकता है। इसका परीक्षण डॉक्टर कर सकते हैं। अगर शंका होती है तो आगे रेडियोलॉजी टेस्ट किया जा सकता है। हांलाकि 80 फीसदी मामलों में यह पता चल जाता है। ब्रेस्ट के अल्ट्रासाउंड के बाद यह पूरी तरह से पता चल जाता है कि महिला गर्भावस्था से संबंधित कैंसर है। कुछ गर्भवती महिलाओं में देर से कैंसर का पता चलता है तो शरीर के अन्य अंगों जैसे फेफड़ों, हड्डी और लिवर में मेटास्टेसिस भी हो सकता है।

गर्भावस्था के दौरान निम्नलिखित परीक्षण नहीं किए जाने चाहिए –

गैडोलिनियम( एमआरआई)- य़द्पि की इस  टेस्ट से किसी तरह का भ्रूण पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है । फिर भी गर्भवती महिलाओं को यह टेस्ट न करवाने की सलाह दी जाती है। जबतक की कोई गंभीर चिकित्सा समस्या न हो।

ट्यूमर मार्कर टेस्ट- कुछ ट्यूमर मार्कर टेस्ट गर्भावस्था के दौरान ब्रेस्ट ट्यूमर का पता नहीं लगा पाते हैं। एक तरह की भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इस तरह के टेस्ट का प्रयोग केवल स्तन कैंसर के एडवांस स्टेज पर ही किया जाता है।

पेल्विक सीटी या एक्स रे-गर्भ में भ्रूण पर विकिरण के संभावित प्रभावों के कारण, एक्स-रे, पेल्विक सीटी, या हड्डी स्कैनिंग जैसे कुछ रेडियोलॉजिकल परीक्षणों की भी सिफारिश नहीं की जाती है।

गर्भावस्था से संबंधित ब्रेस्ट कैंसर के दरम्यान डिलीवरी की प्लानिंग

हांलाकि ऐसा देखा गया है कि अधिकतर महिलाओं गर्भावस्था के समय को पूरी करना चाहती है और नॉर्मल या इंड्यूस्ड डिलिवरी का विकल्प चुनती हैं। लेकिन अगर मां कीमोथेरेपी ले रही है तो इलाज करने वाले सर्जन के लिए यही सुझाप है कि कीमोथेरेपी के अंतिम सेशन के दो या तीन सप्ताह बाद ही प्रसव होना बेहतर है। डॉ. नुपुर कहती हैं कि इसके बारे में ऑन्कोलॉजिस्ट, ब्रेस्ट कैंसर सर्जन और प्रसूति विशेषज्ञ आपसी परामर्श से फैसला लिया जाता है। गर्भधारण से तीन महीने पहले तक ही संबंधित दवा लेना होता है ताकि दवा का आधा असर खत्म हो जाए। कंसिव करने की कोशिश में लगे कप्लस को यह नियमित रूप से सलाह दी जाती है।

 इसका इलाज कैसे किया जाता है?

डॉ नुपुर का कहना है कि पिछले एक दशक में भले ही स्तन कैंसर की घटनाओं में वृद्धि हुई हो, लेकिन कैंसर की देखभाल में जागरूकता, पहुंच और बदलते प्रतिमानों के साथ मृत्यु दर में आहिस्ता-आहिस्ता कमी आई है ।

हांलाकि निदान और स्क्रीनिंग के समय लक्षणों के आधार पर नहीं किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न उपचारों की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए विशेषज्ञ ही सबसे अच्छा उपयुक्त उपचार बता सकता है। हांलाकि स्तन कैंसर के इलाज में काफी प्रगति आई है और इसका पूरी तरह से इलाज किया जकता है। मगर यह निर्भर है कि बीमारी किस स्टेज पर है। इसके आधार पर ही आपको इलाज की सलाह दी जाती है जैसे सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, हार्मोन थेरेपी और बॉलॉजिकल थेरेपी(टारगेटेड थेरेपी)

घावों की गंभीरता, आकार और प्रसार के आधार पर इलाज के मॉड्यूल उपलब्ध हैं, जिनमें शामिल हैं

सर्जिकल इंटरवेंशन- चिकित्सकीय रूप में इसे मास्टेकटॉमी के रूप में जाना जाता है। इसका एडवास्ड स्टेज में प्रयोग किया जाता है। मेटास्टेसिस या ऑड-ईवन खतरने से बचने के लिए एक या दोनों स्तनों में किया जाता है। जबकि प्रारंभिक चरणों में इलाज दवा, कीमोथेरेपी, शल्य चिकित्सा शामिल है। जबकि सर्जिकल इंटरवेंशन अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है। रेडियोथेरेपी- विकिरण के प्रभाव के ख़तरे को देखते हुए, इसका प्रयोग डिलिवरी के बाद ही किया जाता है। मगर जान बचाने की स्थिति में रेडियोथेरेपी उपचार किया जा सकता है। कीमोथेरेपी- पहली तिमाही में इस प्रकार के इलाज से बचा जाता है। पीड़ित रोगियों को दूसरी तिमाही की शुरूआत में इसे दिया जा सकता है।

डॉ.नुपूर कहती हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के बारे में जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह अंतिम अवस्था में पता चलता है। हांलाकि मेटास्टैटिक या एडवांस स्टेज में इसे पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है। इस स्थिति में इलाज का लक्ष्य पूरा  करना होता है( जहां ट्यूमर सिकुड़ता है या गायब हो जाता है)

 

 

 

 

 

 

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Ranjeet Kumar

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. न्यूज़ चैनल, प्रोडक्शन हाउस, एडवरटाइजिंग एजेंसी, प्रिंट मैगज़ीन और वेब साइट्स में विभिन्न भूमिकाओं यथा - हेल्थ जर्नलिज्म, फीचर रिपोर्टिंग, प्रोडक्शन और डायरेक्शन में 10 साल से ज्यादा काम करने का अनुभव.
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