गर्भावस्था के दौरान महिलाएं मानसिक परेशानी से दूर रहें, अन्यथा होने वाले बच्चे पर पड़ सकता है असर

▴ गर्भावस्था के दौरान महिलाएं मानसिक परेशानी से दूर रहें, अन्यथा होने वाले बच्चे पर पड़ सकता है असर

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। अगर महिलाएं इस दौरान टेंशन में रहती हैं, तो इसका सीधा असर उनके होने वाले बच्चे पर पड़ता है।


गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। अगर महिलाएं इस दौरान टेंशन में रहती हैं, तो इसका सीधा असर उनके होने वाले बच्चे पर पड़ता है। यह बात हाल ही में किए गए एक शोध में पता चला है। यह शोध कनाडा में किया गया है। 

कनाडा के शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उन 18 वर्ष की आयु तक के बच्चों में अवसाद विकसित होने की संभावना अधिक होती है जिनकी माताएं प्रसव से पूर्व अवसाद से पीड़ित होती हैं। 

शोधकर्ताओं की टीम ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान तकरीबन 20 फीसदी महिलाएं अवसाद से पीड़ित रहती हैं और उसके भ्रूण पर पड़ने वाले प्रभाव अब भी स्पष्ट नहीं है। पूर्व शोधों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान मां को होने वाले अवसाद से बच्चों में व्यवहार संबंधी और विकास संबंधी समस्याएं होती है। 

बेटे का दिमागी नेटवर्क कमजोर होता है-

शोधकर्ताओं के अनुसार अवसादग्रस्त माताओं के बेटों के दिमाग के कनेक्शन कमजोर होते हैं जिससे उनके व्यवहार पर असर पड़ता है। अध्ययन में पाया गया कि बच्चों के मस्तिष्क में कमजोर सफेद मैटर भी बढ़ी हुई आक्रामकता और सक्रियता से जुड़ा था।

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कालगेरी की टीम ने 54 गर्भवती महिलाओं पर और उनके बच्चों पर अध्ययन किया। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं से कई बार सर्वे भरवाया गया जिसमें उनसे अवसाद के लक्षणों के बारे में पूछा गया। बच्चों के जन्म के बाद शोधकर्ताओं ने उनका डिफ्यूज एमआरआई किया जिससे उनके दिमागी नेटवर्क में बारे में जानकारी मिली। 

भावनाओं को काबू नहीं कर पाते-

शोधकर्ताओं ने कहा कि प्रसव पूर्व माताओं में अवसाद होने का संबंध बेटों के दिमाग में कम सफेद मैटर होने से पाया गया। सफेद मैटर मस्तिष्क में भावनात्मक प्रक्रियाओं का प्रसंस्करण करता है। ऐसे में सफेद मैटर कमजोर होने से बच्चे भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते। ये कमजोरियां बच्चों में तथाकथित 'विकृत भावनात्मक अवस्थाएं' पैदा कर सकती हैं - जिसमें वे भय, उदासी या क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाओं की तीव्रता और अवधि का प्रबंधन करने में असमर्थ हो जाते हैं। इससे पता चलता है कि क्यों अवसादग्रस्त माताओं के बच्चों में बीमारियां पनपने का जोखिम ज्यादा होता है। 

बेहतर देखभाल की जरूरत-

शोधकर्ताओं ने कहा कि इस शोध के निष्कर्षों से सुझाव मिलता है की प्रसव पूर्व माताओं में मौजूद अवसाद की पहचान कर उसका इलाज किया जाना चाहिए ताकि उनके बेटे के विकास पर इसका असर न पड़े। उन्होंने कहा, माताओं के अवसाद के कारण बच्चों की दिमागी संरचना में होने वाले बदलाव से उनके व्यवहार पर असर पड़ता है। प्रसव पूर्व माताओं की बेहतर देखभाल की जानी चाहिए।

Tags : #women #pregnancy #womenhealth #childcare #health

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Ranjeet Kumar

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. न्यूज़ चैनल, प्रोडक्शन हाउस, एडवरटाइजिंग एजेंसी, प्रिंट मैगज़ीन और वेब साइट्स में विभिन्न भूमिकाओं यथा - हेल्थ जर्नलिज्म, फीचर रिपोर्टिंग, प्रोडक्शन और डायरेक्शन में 10 साल से ज्यादा काम करने का अनुभव.
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