भारत में 2025 के बाद अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों की संख्या होगी अधिक

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21 सितंबर को विश्व अल्जाइमर दिवस मनाया जाता है। इस बीमारी के प्रति जागरूक होना बेहद ज़रूरी है। भारत में इस बीमारी का ख़तरा सबसे ज्यादा है।


21 सितंबर को  अल्जाइमर जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस बीमारी के प्रति जागरूक होना बेहद ज़रूरी है। भारत में इस बीमारी का ख़तरा सबसे ज्यादा है। इंडिया एजिंग रिपोर्ट के अनुसार,  भारत में 2025 से साल दर साल बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। ऐसे में अल्जाइमर, डिमेंशिया या अन्य मानसिक रोगों के इलाज के लिए बड़े तौर पर तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। एकल परिवारों, तनाव के साथ बदलती जीवनशैली और खान-पान भी इन बीमारियों के मरीजों की तादाद बढ़ाएगा। 

लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग और अन्य तरह की बंदिशों के दौर में पहले ही अकेलेपन, तनाव और उम्र के कारण पहले ही अल्जाइमर, डिमेंशिया के शिकार लोगों की स्थिति पहले ही खराब थी। ऐसे में उनके संक्रमित हो जाने के बाद अस्पताल या होम आइसोलेशन ने स्थिति को और दयनीय बना दिया है। परिवार, दोस्तों से दूरी के साथ अस्पतालों में संक्रमण के खतरे के कारण पीपीई किट में स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी ने उन्हें अलग-थलग कर दिया है। भय-दहशत, बेचैनी ने उन्हें असमय मौत की ओर धकेल दिया है। 

शोधकर्ताओं का कहना है कि सामान्यतया अल्जाइमर 60-65  साल से अधिक उम्र वालों को शिकार बनाता है। साथ ही दुनिया में कोविड से मारे गए 86 फीसदी लोग भी 65 साल से ज्यादा उम्र के हैं। लेकिन अल्जाइमर 50 साल से कम उम्र लोगों में भी तेजी से बढ़ रहा है। डिप्रेशन, हाइपरटेंशन, डायबिटीज, धूम्रपान, शराब जैसे चीजों से लोग कम उम्र में ही याददाश्त खो रहे हैं। उनकी सोचने-समझने, रोजमर्रा के कामकाज की क्षमता प्रभावित हो रही है। 

शोधकर्ताओं ने सिफारिश की है कि सरकारें और स्वास्थ्य एजेंसियां इन मानसिक रोगों के आधार पर भी कोविड के मरीजों और मौतों के मामलों का अलग वर्गीकरण करें। उनके लिए मनोचिकित्सकों की तैनाती करें। जिस तरह कोविड संक्रमण के बावजूद हृदय या कैंसर जैसे रोग की दवाएं बंद नहीं की जा सकती, वैसे ही दवाओं के साथ सामाजिक मेलजोल और भावनात्मक लगाव मानसिक रोगियों के ऑक्सीजन सपोर्ट की तरह है, जिसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। 

संगठन को दुनिया भर में अल्जाइमर-डिमेंशिया केयर एंड सपोर्ट सेंटर बंद करने पड़े। मनोचिकित्सक और विशेषज्ञों तक भी मरीज नहीं जा पाए। यही वजह है कि कोविड संक्रमण के बाद बहुत से अल्जाइमर मरीजों को नहीं बचाया जा सका। डिमेंशिया एलांयस पार्टनर की सह संस्थापक केट स्वाफर का कहना है कि मानसिक रोगों से पीड़ित की उपेक्षा नहीं की जा सकती। सामाजिक धब्बे को दूर उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सेवा मिलनी चाहिए। 

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Ranjeet Kumar

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. न्यूज़ चैनल, प्रोडक्शन हाउस, एडवरटाइजिंग एजेंसी, प्रिंट मैगज़ीन और वेब साइट्स में विभिन्न भूमिकाओं यथा - हेल्थ जर्नलिज्म, फीचर रिपोर्टिंग, प्रोडक्शन और डायरेक्शन में 10 साल से ज्यादा काम करने का अनुभव.
नोट- अगर आपके पास भी कोई हेल्थ से संबंधित ख़बर या स्टोरी है, तो आप हमें मेल कर सकते हैं - [email protected] हम आपकी स्टोरी या ख़बर को https://hindi.medicircle.in पर प्रकाशित करेंगे

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